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चार लोग

मेरी माँ बचपन से कहती थी, ये मत कर, चार लोग क्या कहेंगे . मैं यही सोचता था ये साले चार लोग हैं कौन , ज़िन्होने  मेरी ज़िंदगी में धनिया बो दिया है.. फिर कुछ लोगो  कोे देख कर समझ आया  कहीं ये वही चार लोग तो  नही जो मिस्टर इंडिया बनके धनिया बो रहे हैं...... पहले हैं ,ये साराहाह वाले जो फेसबुक पे पोस्ट शेयर करते हैं . मेरा तो सच्चाई और अच्छाई  से भरोसा  उठ गया था भाई  . मुझे क्या पता था वो सारे सर्वगुन सम्पन्न  लोग मेरी फ्रेंड लिस्ट  में हैं . दुसरे , जो अपनी फेसबुक  प्रोफाईल  पिक पर पिक्चर गार्ड/ प्रोटेक्टर  का यूज़ करते हैं . अरे 70 हजार का फ़ोन चलाने  वालो  स्नैप शाट नामक चीजे भी होती है .ये वही लोग है जो ऐप्पल का फ़ोन लेते ही इसलिये हैं की बता सके ये एंड्राएड  से बेहतर क्यूँ हैं . इन लोगो  का तो ये भी कहना है  मख्खन शब्द का इजाद ही ऐप्पल  का टच चलाने के बाद हुआ . तीसरे ,वो ...जो आंग्ल भाषा  के हर अगले सेनटेन्श  में "like" शब्द  का प्रयोग करते हैं . अरे भाई तुम बिलकूल भी "cool" नही लगते li...

मकान

प्यार तेरा सरकारी मकान जैसा ही था ,ज़िंदगी  लगभग गुजर ही गयी, किराया तो नाम का था कीमत कहां थी उसकी. कीमत का अहसास उस दिन हुआ जब मकान छोडने का वक्त आया, ईट गारे से एक घर तो खड़ा लिया मैने पर जेहन से पीले रंग की दीवारे और हरे स्लेटी रंग का दरवाजा नहीं गया. कुछ देर के लिये ही सही पर वो मकान ही मेरा घर था .

चार लोग

मेरी माँ बचपन से कहती थी, ये मत कर, चार लोग क्या कहेंगे . मैं यही सोचता था ये साले चार लोग हैं कौन , ज़िन्होने  मेरी ज़िंदगी में धनिया बो दिया है.. फिर कुछ लोगो  कोे देख कर समझ आया  कहीं ये वही चार लोग तो  नही जो मिस्टर इंडिया बनके धनिया बो रहे हैं...... पहले हैं ,ये साराहाह वाले जो फेसबुक पे पोस्ट शेयर करते हैं . मेरा तो सच्चाई और अच्छाई  से भरोसा  उठ गया था भाई  . मुझे क्या पता था वो सारे सर्वगुन सम्पन्न  लोग मेरी फ्रेंड लिस्ट  में हैं . दुसरे , जो अपनी फेसबुक  प्रोफाईल  पिक पर पिक्चर गार्ड/ प्रोटेक्टर  का यूज़ करते हैं . अरे 70 हजार का फ़ोन चलाने  वालो  स्नैप शाट नामक चीजे भी होती है .ये वही लोग है जो ऐप्पल का फ़ोन लेते ही इसलिये हैं की बता सके ये एंड्राएड  से बेहतर क्यूँ हैं . इन लोगो  का तो ये भी कहना है  मख्खन शब्द का इजाद ही ऐप्पल  का टच चलाने के बाद हुआ . तीसरे ,वो ...जो आंग्ल भाषा  के हर अगले सेनटेन्श  में "like" शब्द  का प्रयोग करते हैं . अरे भाई तुम बिलकूल भी "cool" नही लगते li...

ड्रैकुला के बहाने

एलिजाबेटा ड्रैकुला की वाइफ थी। ड्रैकुला उसको बहुत प्यार करता था। एक बार ड्रैकुला को तुर्कियो के खिलाफ एक लड़ाई में जाना पड़ा । कुछ दिनों बाद खबर आती है , ड्रैकुला मर गया (जो कि गलत खबर होती है) । खबर सुनकर एलिजाबेटा सुसाइड कर लेती है। ड्रैकुला वापस आता है । भगवान को कोसता है और शैतान के साथ समझौता करता है कि वो उसे पिशाच बना दे जो दूसरों के खून पर जिंदा रहता है ताकि वो अपना बदला ले सके । कहानी फिक्शनल है लेकिन फेक न्यूज़ का एक बहुत अच्छा example भी । इस जमाने का सबसे घातक जहर है "फेक न्यूज़" । कोई त्रासदी भी आये तो हज़ार 2 हज़ार मरेंगे , पर फेक न्यूज़ तो हर रोज़ दंगे फसाद करवा रहा है। अगर नेहरू और गांधी (या कोई अन्य फ़ोटो)से रिलेटेड कोई फ़ोटो व्हाट्सएप्प पे वायरल हो जाये तो तो ये प्रश्न नही उठेगा की क्यों फ़ोटो पोस्ट की गई , पर लोग ये जरूर कहेंगे "ये गांधी है नंगी लड़कियों के साथ हमारा राष्ट्र पिता" । कुछ लोग इसे वेरीफाई करेंगे कुछ सच मान लेंगे । फिर फारवर्ड भी कर देंगे । इसी तरह हर एक जाति समुदाय वर्ग पार्टियों के अपने अपने ग्रुप बन गए है। सब अपने को श्रेष्ठ और दूसरों को गलत ब...

इतिहास

इतिहास दो तरह का हो सकता है । एक जो दिखाई देता है दूसरा वो जो देखा जा सकता है, अब ये इस बात पर निर्भर है कि हम उसे कैसे देखना चाहते हैं। लोगो के अपने अपने मत हो सकते हैं इतिहास के किसी घटना विशेष को लेकर । ये मत इतिहास को डायनमिक बनाते हैं, लेकिन इतिहास अगर डायनामिक है तो इतिहास कैसे ?ऐसा समझिये की कई सारे आभासी  ब्रह्मांड एक वास्तविक ब्रह्मांड के समानांतर  चल रहे हों , फिर भी एक बात तो निश्चित तौर पे कही जा सकती है कि घटना के घटने का कोई एक मूल कारण (उत्प्रेरक कई हो सकते हैं)अवश्य रहा होगा और ऐसा बिल्कुल भी जरूरी नही जो हम जानते हैं वही सत्य हो। इतिहास संजीविनी है तो षड्यंत्र भी । मार्ग है तो मार्ग का कांटा भी । इतिहास लिखा जा रहा है तो बनाया (डॉक्टर्ड) भी । इतिहास वर्तमान को रास्ता दिखाता है भविष्य की ओर का , फिर स्वतः कल्पना की जा सकती है कि उस भविष्य का भविष्य कैसा  होगा जिसका "इतिहास" इतिहास भी न हो।

मेरे सपनों वाला ब्रिज

बचपन की बात है ,जब मैं छोटा था । छोटा मतलब ये समझिये की आठ नौ साल का तब बहुत सारे  अजीब अजीब सपने आते थे , वैसे वो सपने अजीब नही थे ,सुंदर थे ,बहुत ही सुंदर ,पर क्या है कि जब हम बड़े हो जाते है तो हमें हर वो चीज़ अजीब ही लगती है जो हमारे  प्री डिफाइंड सिस्टम में डाउनलोडेड नही है ।  हमारे सिस्टम का फ़ायरवॉल उसे मालवेयर ही समझता है । अगर ये सॉफ्टवेयर्स इंस्टाल भी हो जाएं तो सिस्टम उन्हें हार्मफुल बता के हटा देता है। बहुत सारे तो नही पर एक सपना याद आता है , मैं सोचा करता था कि , मेरे सारे दोस्तो के घरों की छत एक दूसरे से ओवरब्रिज जैसे किसी चीज़ से कनेक्ट हो जाती तो कितना मज़ा आता , आइस पाइस खेलने का तो और मज़ा था । ब्रिज आने जाने का काम तो करता ही वहाँ ऊपर से सन राइज़ और सन सेट देखना भी कितना अच्छा लगता ।  सपने में जब बरसात होती तो मैं ब्रिज पर जाके ठंडी ठंडी हवा के साथ पानी की खुली बौछारों का मज़ा लेता था। भीगने के बाद तो चाय पीने का मज़ा भी और होता है,  अपने घर चाय पी ली तो फिर ब्रिज से होके दोस्त के यहाँ चले गए, वहाँ पकौड़ी खाने को मिल जाती थी ।  उस टाइम लाइट बहुत जा...

मेरा संघर्ष

मैंने कहा था स्वीपर से मार देते हैं, लेकिन उसने कहा नही साहब नवरात्र चल रहा है। पाप लगेगा , दो एक दिन और रुक जाते हैं फिर दवा डाल देंगे । रात में खा के सुबह परलोक। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था ,उस दिन अगर मैं उसकी बातों में न आया होता तो आज मुझे अपने 1300 रुपये के jbl इयरफोन का गम ना मनाना पड़ता। चार दिन तो हुए थे लिए हुए । चूहों ने काट दिया । काट के इयरपीस भी ले गए ।पता नही सालों को कहां dj बजवाना था।सुबह अच्छा खासा छोड़ के गया था शाम को आफिस से आया तो अपना कटा हुआ ईरफ़ोन देख के दिल इंडिया की जीडीपी हो गया । उसी छड़ से ये दृण प्रतिज्ञा कर ली की कुछ भी हो अब इनका समूल नाश होगा। अब हमरी जिंदगी का एक्क मक़सद है , "सब चूहा लोग का मौत "। एक एक को रैट किल खिला खिला के मारेंगे।

दुःख और संघर्ष

हम में से ज्यादातर लोग दुख और संघर्ष को एक ही समझ लेते हैं, पर ऐसा बिल्कुल नही है।ऐसे में आज एक बात याद आती है।  संघर्ष जीवन का एक जरुरी अंग है ,जीवन की एक पर्यायवाची, संघर्ष इंसान को बेहतर बनाता है। सबके अलग अलग संगर्ष हैं।किसी का आईएएस बनने का , किसी का एक्टर बनने का, किसी का राइटर बनने का। ये कुछ बनने का ,करने का प्रोसेस ही संघर्ष है। दुःख ये है कि किसी अपने का असमय चले जाना, माँ का बच्चे से हमेशा के लिए अलग हो जाना। ये दुख है , इसकी छतिपूर्ति नही की जा सकती। इन्ही बातों को याद करते हुए आज फिर मै चूहों के साथ अपने संघर्ष को एक कदम आगे ले गया हूँ।चूहों से जंग आज भी जारी है ।JBl cs 100i ईयरफोन्स का जाना एक दुखद घटना थी। पर" चूहें हैं समान तो काटेंगे "वाला फ्रेज मैं अपने जीवन मे अब और आगे चरितार्थ नही होने दूँगा ।रैट किल अपना काम कर रहा है। पर लगता है कोई चुहिया मर गयी , सब चूहा लोग फैज़ल बन गया है।बहुते एग्रेसिव हो गया है । एहि सब के बीच में हम चूहा लोग का पाछे सोनी का नया MDR-EX1501P इयरफोन आर्डर किया है अउर जो पहलका गाना सुने उसका बोल लिखे हैं  साहिर लुधियानवी  ,गायक है...

इन लव विथ टोक्यो

रफ़ी साहब का एक गाना है। सिनेमा का नाम था लव इन टोक्यो । वैसे तो इस पिक्चर का हर गाना ही अच्छा है। पर दो गाने मुझे खास तौर पर पसंद आते हैं। पहला गाना है जो लता जी ने गाया ।" कोई मतवाला आया मेरे द्वारे", दूसरा गाना है "आजा रे आ ज़रा" । इस गीत में खूबियों की क्या बात की जाए। बहुत सारी हैं। सबसे पहला क्रेडिट जाता है शंकर जयकिशन साहब को , जिनकी म्यूजिक का मैं बहुत बड़ा फैन हूँ । अपने जमाने के हिसाब से बहुत ही आगे की और ज़बरदस्त म्यूजिक इस जोड़ी ने तैयार की। शंकर जैकिशन को यू समझिये की जैसे बाहुबली प्री एरा और बाहुबली पोस्ट एरा । ऐसा नही था कि शंकर जयकिशन के पहले अच्छी म्यूजिक नही दी जा रही थी लेकिन इन्होंने म्यूजिक का कैनवास बदल के रख दिया । भारतीय संगीत में ऑरकेस्ट्रा का लाया जाना शंकर जयकिशन की देन है। अब म्यूजिक में सिर्फ तबला और हारमोनियम ही नही थे बैकग्राउंड में चालीस चालीस वायलिन बज रहे होते थे ,आठ नौ टाइप के परकशन चल रहे थे, सेलो और पियानो जैसे अपारंपरिक वाद्य यंत्रों का यूज़ शंकर जयकिशन ने अपने संगीत में बख़ूबी किया । जब बाकि संगीतकार धुने बना रहे थे तो शंकर जयकिशन सिम...

बीमार होने में वो मज़ा न रहा

बीते दिनों की याद आते ही याद आता है कि जिंदगी मुश्किल थी पर लोग आसान थे, आज जिंदगी आसान है और लोग मुश्किल। न जाने ही कितने पहरे और सरहदें बना ली है अपने दरम्यां हमने । कोई रिश्ता सीधे मतलब का नही बल्कि और कहो तो मतलब के ही सब रिश्ते दिखाई देते हैं। अनाज गेंहू में तो मिलावट थी ही पर सब्र था कि ये अनाज खा के बीमार पड़ भी गए तो , चार जानने वाले धमक पड़ेंगे। कोई सर दबा देगा, कोई थर्मामीटर लेकर बैठ जायगा , कोई डॉक्टर बुला लेगा । जब ऐसा माहौल हो तो कौन बीमार नही पड़ना चाहेगा । बीमारी फिर बीमारी कहाँ रहती है। अपनापन ,दोस्ताना माहौल और प्यार की ताकत क्या होती है। ये  ऐसे वक़्त ही समझ  आता था। अगर ऐसा ही माहौल बना रहता तो शायद कैंसर का भी इलाज नही कराना पड़ता।  हा जी ये थोड़ा ज्यादा हो गया। पर इसे अतिशयोक्ति अलंकार ही समझ लीजिए । कहने के पीछे भावना ये है कि एक जमाना था, लोग अपने आस पास के लोगो की परवाह करते थे । इस प्रकार का मोरल सपोर्ट रहने पर आज की तरह लोग बीपी, हाइपर टेंशन और अवसाद की बीमारियों से ग्रस्त नही रहते थे। ये आपसी मेलजोल की भावना हमारे कल्चर की एक महान देन थी हमारे समाज को...

हार

ये नजरिये की बात हो सकती है पर मैं समझता हूं कि जिंदगी की खूबसूरती को जीत के वक़्त नही बल्कि हार के समय महसूस किया जा सकता है। सफलता और जीत का जीवन मे एक अलग स्थान है पर ये असफलता होती है जो हमें और बेहतर बनाती है। चीज़ों को देखने के प्रति हमारा नजरिया बदल देती है। हमें ज्यादा ह्यूमेन बनाती है।  जिस वक्त इंसान असफलताओ से घिरा होता होता है, वक़्त उसके लिए धीमा हो जाता है। उसके पास होता है तो सिर्फ वक़्त।ये वही वक़्त होता है जब प्रेम में असफल व्यक्ति गुलज़ार के लिखे गानों का भी मतलब समझने लगता है और कैरियर में असफल व्यक्ति विवेकानंद की जीवनी पड़ने लगता है। असफलता का एक गुण है कि वो हमें मानवीय संबंधों के उन पहलुओं को जानने और समझने के लिए मजबूर कर देती है जो हमारे साथ रहते हुए भी हमें दिखाई नही देते। नज़र का चश्मा और बेहतर हो जाता है।हार पीछे तो ले जाती है मगर और आगे ले जाने के लिए । ये समझने की नही आत्मसात करने की बात है।  हो सकता है कि आप भविष्य में एक बड़ा मुकाम हासिल करें, लक्सरी लाइफ एन्जॉय करें, बुर्ज खलीफा में फाइन डिनर करें, यूरोप घूमें पर अपने संघर्ष के दिनों में दिल्ली के उस 8*...

ग़ज़ल

मिरे जब से हैं बिगड़े हालात सुनिए जो हैं कुछ नही उनकी बेबात सुनिए की हो कायदे में रहें बातें जो हों ये भी क्या हुई बात हर बात सुनिए कहे जा रही है जो मन मे आ रहा है तो फिर क्या ये दुनिया की दिन रात सुनिए हमी खेल में हों कोई दूसरा न मज़ा फिर है क्या जो न शह मात सुनिए अविनाश कुमार "नवाब"

ग़ज़ल

ये दुनिया में भेड़चाल क्यों है सवाल है की सवाल क्यों है नही है जब तो कहो नही भी है हाल ये तो ये हाल क्यों है वो वस्ल की बात पे है ठिठकी न पूछो रुखसार लाल क्यों है चली ही जाती है इक कहानी वो साल हर एक साल क्यों है नाराज भी तुम होती नही हो नही मुझे भी मलाल क्यों है नही है जिनका खुदा है उनका मिसाल भी ये मिसाल क्यों है नवाब

ग़ज़ल

खिर्दो अकल नही कुछ बादाम खा रहे हैं गालिब मगर गधे ही बस आम खा रहे हैं आया समझ है कैसे मछली चढ़ी शज़र पे धोखा  मिला है  उल्टा  इल्जाम खा रहे हैं क्या  क्या ही बेचते  हैं जो शब्द बेचते हैं वो बेच  के  खुदा  का  पैगाम खा  रहे हैं कैसे कहे  उसे  हम झूठा  है आदमी  वो धोखा इसीलिए हम गुलफ़ाम  खा रहे है है मर्ज ये ही अब तो मिलना न हो सकेगा बस हम ज़हर  दवाई  के नाम खा रहे हैं दौलत पे बाप  दादा की ऐश चल रही है आजाद देश को अब हुक्काम खा रहे हैं हैं इस कदर अमादा  खाने को  लोग सारे बाबा जो ढोंग फतवों पर इमाम खा रहे हैं नवाब

ग़ज़ल

जख्म हालातों के भर जायेंगे क्या छोड़ आये हैं जो घर जाएंगे क्या कश्मकश में आजकल हर जिंदगी लोग हद से अब गुजर जाएंगे क्या माना की सबसे बहादुर हम नही तुम डराओगे तो डर जाएँगे क्या वो सलीके से है बातें कर रही माने की रिश्ते बिखर जाएंगे क्या दूर तुम भी हो नही हम भी नही फासले अपने मगर जाएंगे क्या

दीपावली और अंधेरे का अस्तित्व

दीपावली आ गयी मतलब अंधेरा मिटाने का टाइम आ गया। जब से राम अयोध्या से आये लोग अँधेरा मिटाये पड़े हैं। लेकिन अंधेरा वहीं है जहाँ पहले था।सही बात तो ये है की अँधेरा मिटाया ही नही जा सकता । जब कुछ भी नही रहा होगा अँधेरा तब ही रहा होगा, उजाला तो बाद में आया । पता नही बचपन से हमे ये क्यों सिखाया जाता है कि अँधेरे के बाद सवेरा आता है । ये बात ठीक है पर ये भी तो सही है सवेरा खत्म होते ही अँधेरा फिर वापस आता है। ये कोई नही बताता। अंधरे उजाले का कांसेप्ट जोकि हमेशा "सत्य पर विजय और असत्य की हार" में उद्धरत किया जाता है ,कुछ ठीक ठीक नही बैठता। क्योंकि उजाला आते ही अगर सत्य की विजय होती है तो वापस अँधेरा आते  ही असत्य की भी विजय हो जाएगी।समग्रता में इनका मतलब कुछ और ही होना चाहिए ।          बहुत सारे ऐसे सवाल है जिनके जवाब कभी नही मिलते , उजाला अपने साथ स्पष्टता लाता है पर हर सवाल का जवाब बिल्कुल स्पस्ट ही हो ये जरूरी नही। कुछ सवालों के जवाब अंधेरों में ही ढूढने पड़ते है। अंधेरे को खत्म करने से कहीं ज्यादा जरूरी है उसके वजूद को समझना। रोशनी का वजूद अंधेरे में जिंदा तो रह...

बाबाजी का सिम

लगभग 1 साल पहले मैं एक किराने की दुकान पर  कुछ समान लेने गया। तभी एक दूसरा ग्राहक दुकान वाले से अशोक का छोले मसाला मांगता है। उस समय उसके पास अशोक के छोले मसाले खत्म हो गए थे। तो उसने ग्राहक से कहा कि अशोक का नही है पतंजलि का है। मैं सुन के थोड़ा हैरान हुआ। क्योंकि अभी तक उनके मसालों के बारे में नही सुना था। मैंने दुकानदार से मज़ाक करते हुए कहा भैया कुछ ऐसा भी है जो बाबाजी बनाने का नही सोच रहे। दुकानदार ने भी हसते हुए कहा कि बाबाजी तो सब कुछ बना रहे हैं भैया। बस अभी तक पतंजलि का निरोध (कंडोम) ही नही आया है। वही आना बाकी है।पहले वनीला चॉकलेट फ्लेवर तो थे ही अब अश्वगंधा, मुलेठी , और चरणामृत के भी फ्लेवर आयेंगे।हम दोनों ने इस बात पर खूब ठहाका लगाया।  आज एक खबर पड़ी तो ये बात याद आ गयी। खबर ये है कि बाबाजी सिम लांच कर रहे हैं। पतंजलि के सिम का नाम पतंजलि स्वदेसी समृद्धि सिम कार्ड है। अब तो सचमुच लगता है । बाबाजी का निरोध तो आके रहेगा।

स्त्री

स्त्री मूवी देख के निम्नलिखित बातें समझ आयीं। पहली ये की सौ बातों की एक बात , लड़की अगर बोले तो मतलब वो काम करना है।  दूसरी ये की औरत अगर चुड़ैल भी है तो उसकी इज़्ज़त करो। राज और dk ने जब अपनी पहली फ़िल्म बनाई गो गोआ गॉन तो मै समझ गया था ये साले बहुत बड़े बकचोद हैं। इन दोनो का टैलेंट सही जगह निकल नही पा रहा। अब जाके टैलेंट निकला है लौंडो का ,स्त्री में। हालाँकि इस बार डायरेक्शन इनका नही है पर कहानी राज और dk की है।सुमित अरोरा  को भी बराबर क्रेडिट जाता है, उतने ही अच्छे डायलाग लिखने के लिए। मूवी देखकर ऐसा ही लगता है जैसे गांव के चाचा ताऊ कहानी सुना रहे हैं। पता नही हमें हॉलीवुड से क्या ओबसेशन है। अब तक की हर हॉरर मूवी हॉलीवुड के भूतों से ही इंस्पायर लगती है। एक तो साला उनके भूतों और इलेक्ट्रिसिटी का कांसेप्ट ही समझ नही आता।  आधी मूवी में तो लगता है खोपड़ी वाले बल्ब ही ऑन ऑफ कर रहे हैं। हर मूवी में दो चार सौ बल्ब न तोड़ लें तब तक उन बेचारो को इंसलटी फील होता है । अरे अपने देसी भूतो/चुड़ैलों में ही इतने अच्छे कांसेप्ट हैं। बाहर से कॉपी करने की क्या जरूरत है।इंडिया के भूतों को इलेक्ट्...

हिंदी

क्या हम हिंदी का सम्मान करते हैं? इस प्रश्न का जवाब है ।हाँ ,हम करते हैं और यह सत्य भी है।सत्य इसलिए की हमको बचपन से ही बताया गया पढ़ाया गया की हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा (जो की गलत है) है।हिंदी हमारी मातृभाषा है, हिंदी का सम्मान करना चाहिए।हमारे दिमाग में ये बात इतनी डाली गयी तो फिक्स हो गया है कि  हाँ,हिंदी तो बहुत सम्माननीय है।  पर जब ये प्रश्न खड़ा कर दिया जाए की हम हिंदी का कितना सम्मान करते हैं तब पता चलता है कि हम एक झूट को सच समझ कर जी रहे हैं। अब क्या जवाब हो सकता है ,इस प्रश्न का? हम हिंदी को थोड़ा कम सम्मान देते हैं, थोड़े कम से ज्यादा देते हैं या बहुत ज्यादा । क्या करते हैं हम हिंदी के साथ ।थोड़ा समझने की कोशिश करते हैं। किसी अन्य भाषा को सीखने में हिंदी का अपमान नही है। अन्य भाषा यथा आंग्ल भाषा जो की भारत में पहली प्रमुख भाषा है या दूसरी प्रमुख भाषा है या सभी भारतीय भाषाओं में सबसे प्रमुख है, इसमे थोड़ा कंफ्यूज़न है।अंगेज़ी को बोलने में हिंदी का कतई अपमान नही है। आप दिन रात बोलिये।कोई समस्या नही ।हिंदी का अपमान तब है जब आप मेट्रो(ज्यादातर यही देखा है) , प्लेन ,पार्क या कहीं...

जैक स्पैरो , सॉरी कप्तान जैक स्पैरो

महान कप्तान जैक स्पैरो , हम सब को माफ करना। दुनिया के सबसे बड़े समुद्री लुटेरे , जहाज़ों को लूटने वाले। आपने तो उस दिन ही दिल जीत लिया था जब आपने ईस्ट इंडिया कंपनी का जहाज़  लूटा। भाई का बदला लिया। साले अंग्रेज़ 200 साल हमको लूट के गए और आपने उनको लूट लिया।#respect          नाशपिटे यश राज वालों ने आपका rip off कर दिया , पर आपकी स्पिरिट को खत्म नही कर सकते वो। सब कुछ चोरी कर लिया , बैकग्राउंड स्कोर तक नही छोड़ा।आपने अंग्रेज़ो का काटा, ये आपका ही काट गए।        आज स्पैरो भैया की याद आ रही है।कप्तान भैया ब्लैक पर्ल विजेता थे ।भइया तो फ्लाइंग डच मैन भी चलाये थे। वही डेवी जोंस वाला, जो सूंड से हारमोनियम बजाता था। यद्यपि वो दारू के नशे में धूत रहते थे ,लेकिन दिमाग चाचा चौधरी जैसा तेज़।        मुझे बहुत दुख होता था जब यदा कदा उनकी रम खत्म हो जाया करती थी। और वो सवाल करते थे की मेरी रम हमेशा ही खत्म क्यों हो जाती है? "कप्तान भैया मासूम बकचोद थे, खुद ही पी के खत्म कर देते और फिर खुद ही पूछते की रम कहाँ है?" दुश्मन दूर से दिख जाए तो क...