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जख्म हालातों के

जख्म हालातों के भर जायेंगे क्या छोड़ आये हैं जो घर जाएंगे क्या कश्मकश में आजकल हर जिंदगी लोग हद से अब गुजर जाएंगे क्या माना की सबसे बहादुर हम नही तुम डराओगे तो डर जाएँगे क्या वो सलीके से है बातें कर रही माने की रिश्ते बिखर जाएंगे क्या दूर तुम भी हो नही हम भी नही फासले अपने मगर जाएंगे क्या

है मुहब्बत ना ही कोई आसार है

है मुहब्बत ना ही कोई आसार है जिंदगी यूँ है कि जैसे रविवार है तैर आगों के दरिया में ग़ालिब मगर जिंदगी से हमें तो बहुत प्यार है कुछ नही है पता जाना भी है कहाँ जाने को भीड़ सारी पर तैयार है हमसे पूछो न तबियत हमारी कोई वो जो देखें नही समझो बेकार है खुश हैं हम ये हमारी गलतफहमी है पर छोड़ो ये भी तो अच्छा आजार है दिल दवा दारू क्या और चाहिए उस गली में इन्ही का तो बाजार है पूछो मत किस तरह है कटी जिंदगी बस कटा और कटने का आसार है है तुम्हे जो यकीं बाहें जन्नत हैं वो कुछ नही है अभी बस तू बीमार है ये खुमारी भी तेरी होनी है ख़तम चीज़ कहता जिसे आजकल प्यार है जो रकीबो ने माँगी दुआ मौत की बदले मेरे उन्ही के कटे तार हैं समझा मैं जो नही बातें मतलब की ये यार  बन बैठा उनका मेरा यार है जिंदगी चल  रही  थोड़ी थोड़ी सही थोड़ा थोड़ा मगर क्या ही बेकार है मीटर 212 212 212 212 नवाब

फैसला जो भी हो इस दिल का

2122 1122 1122 22 फैसला जो भी हो इस दिल का बताया जाए दिल नही इतना भी हर रोज जलाया जाए हो गुनाह उसका या मेरा मगर हाकिम को जब सुनानी हो सजा मुझको बुलाया जाए कायदा है वो सुनाता कायदे से हमको आइना उसको भी मगर कुछ दिखाया जाए हिज़्र की बात पे मुझसे वो लिपट जाते थे आज आलम है की नाता ही छुड़ाया जाए आग से है जो मुहब्बत तो वफ़ा में अपनी आशियाँ खुद का ही अब खुद से जलाया जाए हैं मिले धोखे ,वफ़ा भी तो लोगो मे होगी हौसला दिल को मगर क्यूँ न दिलाया जाए अविनाश कुमार "नवाब"

वो था कमज़र्फ

वो था कमज़र्फ आफताब हो गया मैं होके अच्छा भी खराब हो गया बेहतरी थी किसमे मैं क्या जनता मिला जो सख्स अहबाब हो गया वो क्या जगा था मुझमें इस  तरह की नींदों का आना ख़्वाब हो गया जहाँ था कभी  झीलों का  शहर सुना पानी वहाँ सुरखाब हो गया

न मोहब्बत है ना ििनतज़ार है

ना मोहब्बत है ना  इंतज़ार है जिंदगी है कि जैसे रविवार है तू आग  दरिया में तैर ग़ालिब हमें  जिंदगी से  बहुत प्यार है जाना है कहाँ कुछ पता  नही जाने को भीड़ मगर तैयार  है हमसे न  पूछो तबियत हमारी वो देखें नही समझो बेकार है हम खुश हैं  ये गलतफहमी है पर छोड़ो ये अच्छा आजार है दिल  दवा  दारू  क्या चाहिए उनकी गली में  यही बाजार है जितने हैं गली मुहल्ले में लौंडे कमजर्फों को तुझी से प्यार है है कटी  की जिंदगी पूछो  मत कटा  है कटने  का आसार  है तुम्हे यकीं बाहों  में जन्नत  का कुछ नही  ये  जन्नती बुखार है खुमारी  ये  भी  उतरेगी  कल चीज़ जिसे  कहते  हो प्यार है रकीबों ने  की दुआ  मौत  की रकीब  मर  रहे  चम्तकार   है नही  समझा आंखों  की बातें आज मेरा  यार उनका यार है जिंदगी चल  रही  थोड़ी थोड़ी थोड़ा थोड़ा  सबका  उधार  है नवाब

न किया हाँ कहने के बाद

ना किया हां कहने के बाद क्या हो जाने क्या के बाद घुल रहा है क्या फ़िकर में क्या रहे घुलने के बाद हैं सवाल अपनी जग़ह क्या हो हल मिलने के बाद मैं था कुछ और पहले हूँ कुछ और जलने के बाद जिंदगी है गयी जाने किधर दर से तेरे चलने के बाद तू मुझको लेने फिर से आये गिरता हूँ सम्हलने के बाद था मुंतज़िर मैं जाने किसका होने से पहले होने के बाद

पहली ग़ज़ल जो मैंने मीटर में लिखी

पहली ग़ज़ल जो मैंने मीटर में लिखी क्या हुआ दिल क्या हुआ मुझको बता कोई आया याद क्या मुझको बता 2122 2122 212 दिल लगाने का हुनर जब था नही दिल लगाया क्यूँ ये दिल मुझको बता इस भरी सी बज़्म में उसका जिकर है चला तो क्यूँ चला मुझको बता ख़ाब मेरे ख़ाब भी मेरे नही सोचता है ख़ाब क्या मुझको बता गिर्या भी है बहते बहते बह गया था रुका तू किस लिये मुझको बता

ठीक था निभा

ठीक था निभा  रस्में जहाँ  पागल हुआ हूँ हो रहा जहाँ और बोले मै  पागल हुआ हूँ 212 1222 1222 122 212  1222 1222 122 बात होती है खत्म चली हो कहीं से ठहरी है कहानी जहां मै वही पल हुआ हूँ हो कोई भी क्यूँ गुनाहगार मेरी मौत का मैं तुझे चाहता था खुद का कातिल हुआ हूँ तुम जो इंतज़ार की बात करते हो तो सुनो मैं आज था पहले  इंतज़ार में कल हुआ हूँ मैं मरूँ और मर ही जाऊं ऐसा भी  नही है ऐसी चार मौतों  से रोज ही घायल हुआ हूँ ख्याल क्या क्या ना आते कर गुजरने  को क्या क्या ही जाने कर रहा पागल हुआ  हूँ 2122 2122 122 2 2122 2122 याद का काम  है आना सो  चली  आती है बरसना चाहता हूं यादों  का बादल हुआ हूँ

ऐसे ही हैं हालात की बस

222 212 122 कौन आया मेरे मन ऐसे ही हैं हालात की बस पूछो मत क्या है बात की बस  जो सब कहते सुन लेते हैं अपनी है खत्म बात की बस तेरे खातिर कभी खुद से ही लड़ते हैं जज्बात की बस दिन का उजियारा दिन की खातिर रातों में करते रात की बस लिख पढ़ सब होशियार हुए करते धरते  जात की बस वो जो ना करनी थी  उसको कर दी है उसने बात की बस वो इश्क़ भी हमसे करता है तो करता है बातें बात की बस रहने दो छोड़ो हाल मेरा हमदर्दी ये खैरात की बस

होकर भय से भयभीत नही

ये कविता परंपरागत फारसी बहर में नही है । परंतु बहर के मानकों को ध्यान में रखते हुए लिखी गयी है इस बहर में भी कई शोरा ने लिखा है। मुझे इस बहर की लय अच्ची लगी ।वैसे तो ये वीर रस की कविता है। उर्दू छंद की दृष्टि से ये रुबाई हो सकती है। मुझे ऐसा लगा कि ये मीटर वीर रस की कविताओं के लिए बहुत उपयुक्त है। मापनी 22 22 22 22 होकर भय से भयभीत नही  अब भय से आगे चलना होगा । हो प्रदीप्त अब अग्नि दीप या जुगनू सा जलना होगा ।। घनघोर तिमिर जब छायेगा और छलिया जाल बिछाएगा । छलके जाए ना छलिया फिर छलिये को छल से छलना होगा ।। कल की खातिर आज चलो गर नही चले तो कल ना होगा । है ढाल व्याध का मेरा भय भय त्यज शस्त्र में ढलना होगा ।। संघर्ष बहुत भीषण होगा रक्त से रंजित कण कण होगा । या तो मैं मारा जाऊंगा या फिर शत्रुदल ना होगा ।।

कठिन है पर सफर तो है

मापनी 1212 1212 कठिन है पर सफ़र तो है नहीं है कुछ सफर तो है छोटा सही एक ख़ाब है चलने को एक डगर तो है हवा हवा नही रही हवा में कुछ ज़हर तो है चलो चलें मेरे यहाँ खुली हवा नहर तो है असर में भी असर नही असर में कुछ कसर तो है तेरा नही है गम हमे कलम तो है बहर तो है जो कह रहे भला बुरा उन्हें भी पर फ़िकर तो है है लाश जैसे चल रही कहने को ये शहर तो है मिटा दो तुम मिटा दे हम हा दिल में एक रबर तो है मिले मिले कि ना मिले ये सोच हर पहर तो है जो सब लिखें वो क्यूँ लिखूं नवाब कुछ मगर तो है अविनाश कुमार 'नवाब'

शरारों शरारों जी जलती ख़बर है

122 122 122 122 शरारों शरारों सी जलती खबर है तुम्हे हो कि ना हो सभी को मगर है जो जाँ दे रहे हम वफ़ा में अभी भी हमें बेवफाई की उनकी खबर है दरारों से क्यों रोशनी आ रही है कहो रोशनी से अंधेरो का घर है है खेले ये दुनिया यूँ दिल से जो मेरे न जाने उसे दिल क्या आया नजर है हो आयीं बहारें कभी इस चमन में अभी जो हैं बागों में जलते शज़र हैं अविनाश कुमार"नवाब" इशारों इशारों में दिल लेने वाले

है कहानी कह रही

है कहानी कह रही कि नया लिखो हो न पाया जो बयां वो बयां लिखो दर्द ओ गम खुशियां हैं सबके ही वही जिंदगी को तुम धुआँ  धुआँ  लिखो आग बुझाने को एक आग लगा दी दलदल के बाद गहरा कुआँ लिखो उसने पर्दे हटा दिए खिड़कियों से हुआ हैै माहौल तुम ख़ुशनुमा लिखो लोग थे बदनाम रातों को कर दिया ये बदनामी है खामा खां लिखो जब कभी तुम मिरी दास्ताँ लिखो मजबूरी  ही उसका उनवां लिखो

ऐसा भी वक़्त दुनिया का रहा है

ऐसा भी वक़्त दुनिया का रहा है समंदर भी हो जब दरिया रहा है तेरे नाम से ग़ज़ल इक लिख रहे हैं बहर में धोखा काफिया रहा है जाने महफ़िल में क्या कह रहे हैं गुबारे दिल ग़ज़ल में आ रहा है नशा बदनाम क्यूँ है जो अगर है होश में भी खराब इंसाँ रहा है हमें रुख्सत भी कर तो जिंदगी यूँ की माँ से मिलने बच्चा जा रहा है अविनाश कुमार "नवाब" 1222 1222 122

तुम मिले हो मैं मिला हूँ

2122  2122 2122 212 तुम मिले हो मैं मिला हूँ पर क्या शायद हम मिले चल रहे जाने किधर हैं क्या पता संगम मिले हो तेरी मजबूरियां कुछ हैं मेरी मजबूरियां दे दगा मजबूरियों को क्यूँ ना अब हम तुम मिले देख दुनिया कह रही क्या लोग इसके कह रहे कब तलक हो सिलसिला ये कुछ हमें मरहम मिले आंधियों का दौर है और चल रही हैं आंधियां कुछ जो ठहरे आंधियां तो दम में थोड़ा दम मिले कश्मकश की आशिक़ी क्या कश्मकश की जिंदगी उम्र तेरे साथ की ज्यादा नही तो कम मिले अविनाश कुमार "नवाब"

हमे दिल देने की

122 122 122 122 हमे दिल देने की सजा दे रहा है वो कबसे मुझे बेवजा दे रहा है जिसे दिल से भेजी दुआ जा रही है मुझे बदले में वो क़ज़ा दे रहा है कैसी कश्मकश में डाले है मुझको ना तो हाँ कहे ना रजा दे रहा है नही खुश है वो भी मुझे देखके यूँ न जाने उसे क्या मज़ा दे रहा है ग़मे दिल ओ गिर्या बेरुखी मायूसी मिटा के हमे वो अफज़ा दे रहा है

ग़मे दिल छोड़

ग़मे दिल छोड़ तू मेरा शौक देख 1222 1222 2122 हटा मोमिन तेरा ,मेरा जौक देख कभी आ ,बैठ ,चाय पी कुछ बात कर समय गुजरा जहाँ ,मिरा वो चौक देख  मसाले मिर्च सा तीखा हो चला हूँ कैसे कैसे लगे हैं ,मुझको छौक देख जला तो आग से ज्यादा ही जलूँगा चाहे तो आग में मुझको झौंक देख बहरे करीब 

दिल दर्द का हो जब से

दिल दर्द  का हो जबसे उनवां चला है हम भी चले हैं दिल  जहां चला है क्या ही रखें यादें बीते  दिनों  की जलती हुई यादों से धुआँ चला है क्यूँ जिक्र भी आये बातों में उसका अभी तक तो जिक्र तन्हा चला है तू  रूठा  है किसी और बात  को पता भी  बातों  का कहाँ चला है कुछ  नही है अपने  दरम्यां  क्यों कैसा ये  दौर  ए  दरम्यां चला  है मुझे रुख़सत करने  तुम न आयीं जमीं भी चली   आसमां  चला है एक  दिन वही  सालों  पहले  का जियें फिर दिल से अरमां चला  है तुम्हें क्या समझें न समझे खुद को कुछ नही तो ये हो तजुर्मा चला है ख़ुद के  ख्वाब ही  न जगा दे  कहीं दिल चुपके दबे पावँ सहमा चला है अविनाश कुमार "नवाब"

जिक्र जब मेरा किसी ने यूँ

जिक्र जब मेरा किसी ने यूँ चलाया होगा आंख भर आयी होगी दर्द बढ़ आया होगा ठीक से भी मना करते तो न बनता हमसे फायदा सब ने इसी तर्ह उठाया होगा हैं हमी एक दिवाने तो नही दुनिया में ढूढ़ के ही हाँ खुदा कोइ तो पाया होगा मर्तबा कितने खयालों में ही गुजरी होगी बात को फिर भी मगर होंठ न लाया होगा वस्ल की बात पे यादें मिरी आयी होंगी रंग कुछ और भी रुखसार पे आया होगा मस्ती खाना है हुआ सबके लिए दिल मेरा खेल कर दिल से लोगो को मज़ा आया होगा 2122 1122 1122 22 होके मजबूर

करना था क्या ही कर भला

करना था क्या ही कर भला बैठे बन वही फिर से सिलसिला बैठे आज तो कर दे इंतहां साकी अबकी दिल ही न हौसला बैठे फिर शराफत से हो भला ही क्या जब बुराई का फैसला बैठे किस तरह जिंदगी जिया जाए हर तरफ पैरों आबला बैठे करके कुछ याद थे चले घर से आके मंजिल पे सब भुला बैठे जान किस किस को दें बताएं क्या सब बना हमसे फासला बैठे अहले दुनिया भी फैसले दे यूँ पढ़के कबसे न जाने ला बैठे अविनाश कुमार "नवाब" 2122 1212 22 फिर छिड़ी रात