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पानी

पानी पानी जीने के लिए बहुत जरूरी है। इस बात को हम सभी समझते हैं। पर ये बात सिर्फ हमी नही समझते पानी भी समझता है। इसलिए पानी ने वहाँ भी जीवन की संभावनाएं बनाई हैं, जहाँ जीवन के होने की कल्पना नही की जा सकती। पृथ्वी के ध्रुवों पर तापमान अत्यधिक कम होने के कारण वहां बर्फ जमी रहती है। बर्फ ऊपर की तरफ से जमना शुरू होती है लेकिन नीचे तली तक बर्फ नही जमती। नीचे वाटर लिक्विड स्टेट में रहता है। इसलिए पानी के अंदर रहने वाले जीव जमकर नही मरते । अब ऐसा होता क्यों है। ऐसा होता है पानी की एक अनोमली कि वजह से। वैसे तो पानी की 70 अनोमली हैं, पर जिस अनोमली की बात यहाँ की जा रही है वो है पानी की डेन्सिटी में तापमान के कारण होने वाला चेंज। जब पानी का टेम्परेचर कम किया जाता है तो पानी की डेंसिटी बढ़ती है। पानी की अपर सरफेस जैसे ही ठंडी होती है ,उसकी डेंसिटी भी हाई हो जाती है।हाई डेंसिटी वाटर नीचे की तरफ चला जाता है। पानी का टेम्परेचर कम होते होते जब 4℃ तक पहुंचता है, तो पानी की डेंसिटी मैक्सिमम हो जाती है। मान लिया जाए कि पानी से भरी एक लेक है तो पानी की मैक्सिम डेंसिटी 4℃ पर होगी। अब टेम्परेचर को अगर ...

हिन्दू कोड बिल v/s डॉ अम्बेडकर

हिन्दू कोड बिल v/s डॉ अम्बेडकर आज के दिन उन प्रेमी युगलों को डॉ आंबेडकर का धन्यवाद जरूर करना चाहिए, जो प्रेम विवाह या फिर इंटरकास्ट मैरिज करना चाहते हैं। यही नही वो लोग भी आभारी हो सकते हैं , जिनको तलाक का अधिकार प्राप्त हुआ।मृतक की विधवा, पुत्री को उसकी संपत्ति में बराबर का अधिकार , इसके अतिरिक्त, पुत्रियों को उनके पिता की संपत्ति में अपने भाईयों से आधा हिस्सा मिलना । ये सारे अधिकार प्राप्त हुए। पर जितनी आसानी से इन अधिकारों का प्रयोग आज होता है, उससे कही ज्यादा कठिनाई हुई इसको लागू करने में। अगर बाबा साहब और पंडित नेहरू ने जिजीविषा न दिखाई होती तो ये बिल कभी लागू ही नही किया जा सकता था। इस बिल का विरोध अपने उच्चतम स्तर पे किया गया। पूरे देश मे आंदोलन किये गए। इस बिल को लेकर बाबा साहब के साथ सिर्फ पंडित नेहरू ही खड़े दिखाई दिए। यहाँ तक कि खुद उनकी कांग्रेस पार्टी के मेंबर भी उनका पुरजोर विरोध कर रहे थे। जिसमें तत्कालीन राष्ट्रपति महोदय डॉ राजेन्द्र प्रसाद बिल विरोधियों के अगुआ थे। उन्होंने यह तक कह दिया कि ये बिल आया तो वो इस्तीफा भी दे देंगे। पहली बार ये बिल 1947 में पेश किया गया,...

फेमिनिज्म

फेमिनिज्म आपने फेमिनिज्म के बारे में सुना होगा। फेमिनिज्म को लेके बहुत मिसकॉन्सेप्ट हैं सोसाइटी में।पहली बात तो ये की फेमिनिज्म शब्द का फेमिनिन से कुछ लेना देना नही है। एक पुरुष भी फेमिनिस्ट हो सकता है। दूसरी बात ये की फेमिनिस्ट से ज्यादा सुडो फेमिनिस्ट हैं सोसाइटी में। अब ये सुडो फेमिनिस्ट वहीं है जो लड़के लड़कियां बराबर हैं ,वाली बात तो करते हैं। पर जब शादी की बात आती है ,तो लड़का वही ढूढ़ते है जिसकी सैलरी ज्यादा हो और जात बिरादरी का हो। अगर रेस्टोरेंट में खाना खाया तो मानते हैं कि बिल लड़के को देना चाहिए और इत्यादि इत्यादि । आपको तो पता ही होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो ये सुडो फेमिनिस्ट उतने ही फेमिनिस्ट होते हैं जितना हम ये समझते हैं कि पीटर इंग्लैंड , मंटों कार्लो, लुइ फिलिप जैसे ब्रांड, फॉरेन ब्रांड है। जबकि हकीकत ये है कि ये सारे ब्रांड ही इंडियन हैं। खालिस देसी । और बताओ साला हम समझते थे की राजू बन गया जेंटलमैन। कभी फेमिनिज्म का सपोर्ट करती हुई लड़कियों को देखा है । नही देखा है तो यु ट्यूब पर देखिएगा , बहुत वीडियो हैं। अब वो सही कहती हैं या गलत इस पर कमेंट नही करूँगा । क्यूँ की ...

जलकुंभी

जलकुंभी बुरे ख्याल पानी मे जलकुंभी की तरह होते हैं। एक ख्याल ,दो और बुरे ख्यालों को पैदा करता है । अगले ख्याल फिर चार और पैदा कर देते हैं। एक सिरीज़ प्रारंभ हो जाती है। एक छोटा सा लगने वाला बुरा ख्याल , ख्यालो और सवालों की अनन्त जलकुंभी फैला देता है। जलकुंभिया रोज अपनी जड़ें मजबूत करती चली जाती हैं। पानी का बहाव रुकने लगता है। पानी मे सड़न की शुरुवात हो जाती है। ये सड़न गलन जलकुंभियों के लिए खाद का काम करते हैं। जलकुंभिया इतनी फैल जाती है कि ढूढ़ने से भी जलकुंभी का प्रारम्भ और अंत नही मिलता। मस्तिष्क सवालों का जवाब भी तैयार करता है पर जवाबों में भी ये जलकुंभिया उलझी रहती हैं। स्पष्ट कुछ भी नज़र नही आता। जवाब भी एक नया सवाल खड़ा करते नज़र आता है। इन सवालों जवाबो से निपटने की ट्रेनिंग कोई नही देता। जिंदगी एक अच्छी प्रशिछक है पर उसकी फीस बहुत ज्यादा है । इसका कोर्स भी कभी खत्म नही होता। चूंकि ये जिंदगी है तो इस पर कोई रूल्स रेगुलेशन भी नही हैं, ये अपने हिसाब से मार पीट के सिखाती है। ऐसा नही है कि इस समस्या का कोई अल्टरनेट सोल्यूशन नही है , हज़ारो सालों से बहुत से लोग आए । बहुत अच्छे अच्छे लोग ...

आर्टिकल 110 की हत्या और अपना शक्तिमान

कहानी की शुरुवात होती है 23 अगस्त 1954 से जब पहली बार राज्य सभा अस्तित्व में आयी।  इसके आने से पहले constituent assembly में बहुत मारा मारी भी हुई । तर्क ये था कि फेडरल सिस्टम को बचाना है तो राज्य सभा जरूरी है। राज्य सभा को बनाया गया ताकि संसद में किसी भी  बिल को बिना पच्छपात के सूझ बूझ एवं  तर्क विमर्श के साथ  पारित किया जा सके । राज्य सभा का कांसेप्ट बेहतरीन था जो की लोक सभा पर चेक और बैलेंस के लिए बनाया गया था, जिससे लोक सभा के गलत कामो पर लगाम लगायी जा सके,  परन्तु  श्रीकृष्ण जो ज्ञान गीता के उपदेश में देना भूल गए वो ये था कि भविष्य में राज्य सभा की सभी  विपछी पार्टियां राज्य सभा की शक्तियों का प्रयोग राज्य हितों के लिये कम(या बिल्कुल नही) और पैसा लगा के इलेक्शन हारे हुए दबंग नेताओं , बिसनेस मैन जिन्होंने पार्टी को फंडिंग दी है , उनकी संसद के अंदर बैक डोर से एंट्री कराने के उद्देश्य से ज्यादा की जायेंगी।  गलत कामो पे लगाम लगाने की बजाय ये विपछी पार्टियां लोक सभा की रूलिंग पार्टी  पर स...

देश जल रहा है

देश जल रहा है सड़के जल रही हैं  न्यूज़ चल रही है  बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ  लोग सड़को पर हैं  हथियार हाथों में  गुस्सा बातों में  हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं  डेरा उठ चूका है  डेरे वाले बैठे हैं  फिर से माचिस पेट्रोल लेकर  माहौल  खटरनाक है 

मकान ही मेरा घर था

प्यार तेरा सरकारी मकान जैसा ही था ,ज़िंदगी लगभग गुजर ही गयी, किराया तो नाम का था कीमत कहां थी उसकी. कीमत का अहसास उस दिन हुआ जब मकान छोडने का वक्त आया, ईट गारे से एक घर तो खड़ा लिया मैने पर जेहन से पीले रंग की दीवारे और हरे स्लेटी रंग का दरवाजा नहीं गया. कुछ देर के लिये ही सही पर वो मकान ही मेरा घर था