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अनकही

कुछ  अनकही  शर्ते  ही  हैं मुहब्बत   किधर है तो  ये  धागे  टूट  जाने  हैं  गफलत   किधर  है यूँ   तो  अच्छा  था  बचपना   जिसे  मार   डाला बड़े     होने     में     भी    मुसर्रत   किधर   है चला    जाऊँ    कही    भी   ठहरा   वही   हूँ जुदा  हुआ  तुमसे  अब  भी  वक़्त  मुंतज़िर है अभी    जागा   कोई   अभी   कोई   मर   गया महीना    जून    का   और    वक़्त   दोपहर है तेरे     नाम     पर    कत्त्ल    कर     रहा   वो खुदा    तेरा    नमाज़ी     सख्त    बेख़बर   है दरख़्ते       काटी      सौदा - ए - ज़मीं      को ऐसी   भी  लोगो  ...

ईश्वर अल्लाह एक है ?

कई सालो से एक ग़लत विचार समाज मे प्रसारित किया जा रहा है. विचार ये की "ईश्वर अल्लाह एक है". प्रमाण के तौर पर वर्तमान परिपेछ्य और भूतकाल मे घटित घटनाओ के परिणाम देखे जा सकते है. ये विचार एक सुंदर कलाकृति के भाँति ही है,जिसमे लाल रंग भी है हरा भी है तथा और भी विभिन्न प्रकार के सूछ्म रंग है. जिस किसी ने भी इस चित्र की रचना की,अत्यंत ही सुंदर,मनमोहक चित्रण प्रस्तुत किया,परंतु इसकी विश्वनीयता पर प्रश्‍न हैं. प्रश्न जो चित्र की प्रचंड आभा मे छिप गये, पर समय के साथ रंग फीके पड़ रहे हैं. प्रश्न फिर से बाहर आ गये हैं. प्रश्न की भाषा कुछ भी हो सकती है पर उसके मूल में अस्तित्व की ललकार है.

Might Have Been

Reminiscenes are the trap not what we ween let them go and you will know what i mean That truth we hold so far could be a decoy beauty is a myth what virtuous may be sheen Far time was dark but truth shall glean what hide inside the souls if pure & clean For once and all let consience be redeemd else won’t be a place beyond us & between We all keep a dream nobody ever have seen where life goes wild and desires go green There's always a past not going to change & a journey you would wish might have been

मिलती नही

कह गये जो इश्क़ की आग मे जलने का मज़ा है क्या  बताउ उन्हे  इधर  चिंगारी भी  जलती  नही और   जलाने   की  चीज़    भी    मिलती    नही दोस्त  मैने   तुमसे  एहसान  लिया की क्या लिया अब   आँखे    नीदो   से   कभी    मिलती   नही और    नीदे   आँखों    से   कभी   मिलती   नही एक  रोज़  वो  भी  मिली  चौराहे  पर, क्या  कहे बाते    भी   उनसे   बनाए   कोई   बनती    नही और    नज़रे    हमसे    मिलाए    मिलती    नही  जितनी  भी  दुनिया  देखी  है इतना ही समझा है घर     से   अच्छी    रोटी    कही    बनती    नही और  माँ  से  पहले   कोई  दुनिया  मिलती   नही

इंतज़ार

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दो पल की जिंदगी उधर चाहता हू हा मरने से पहले एक बार चाहता हू चाहता हू खाक बनने से पहले और राख अपनी उड़ने से पहले ये कहना  .............. ये कहना की तेरा हाथ नही मागा था तेरा साथ नही मागा था माँगा था तो बस तेरा इंतज़ार......... इंतज़ार की जिसमे दिन महीने साल गुज़र जाए और वक़्त का साहिल तोड़ के हम उस पर निकल आए जहाँ पर फिर तेरा इंतज़ार हो........ और इस इंतज़्ज़ार की उम्र हज़ार हो........... क्योंकि इस इंतज़ार में वॅहम था तुझे पाने का वजह थी एक झूठी ख़ुसी की और मौका था मुस्कुराने का......................

परेसान

ऐसा नही की फ़िकरों से मैं तुम्हारी अन्जान हूँ, कुछ है कारे-जहाँ बाकी अभी जिनसे परेसान हूँ. शिकायत-ए-इख्तिलात वज़ा तुमाहरी दरम्यान हमारे, है अभी हर साँस उधार अभी इन उधारो से परेसान हूँ. मुर्सद मिला भी तो मुझे ऐसा मिला ज़माने में, चलके रास्ते उसके अब मैं मंज़िलो से परेसान हूँ. ना जाने क्यूँ रोशनी चुभने लगी है इन आखों को, तुम अंधेरो से परेसान हो मैं उजालों से परेसान हूँ. मुस्करा के जो भी मिला राहों में, मैने उसे अपना समझ लिया दुश्मन लगने लगे है बेहतर की मैं दोस्तो से परेसान हूँ. हसाता रहा जिन को मैं ता-उम्र,परवाह नही अस्को की मेरे उनको हस्ते हैं मेरे पीछे वो, निभा के रिस्ते मैं रिस्तो से परेसान हूँ. हक़ीकत यही की सब कुछ बदलता नही , बस लगता है तुम जिस कल से परेसन थे , मैं उस आज से परेसान हूँ. इख्तिलात- separation, मुर्सद-pioneer

नवाब

हुए हम भी जवां तो देखा करते आए ज़माने को करके इश्क़ लोग राहे-फ़ना में जलने से डरा  करते हैं एक हम थे तैयार बैठे रहे फ़ना होने को कबसे जो याद ही ना आई किसी को कि ज़माने मे हम भी रहा करते है मुझे प्यास भी मिली और दरिया भी, पर दर्द का सबब ये जब गैर प्यास बुझाते हैं हम तमाशा देखा करते हैं तबीयत से रो ही लें हालातों पर तो बोले अश्क अंदर ही पी लो इन्हे कह दे ना ज़माना झूठा इतनी शर्म हम भी किया करते हैं तलाशते रहे मौके नवाब उम्र भर कि सारे हसी कारवाँ गुज़र गये हम कल भी रहे ख्याल में आज भी उन्ही मे जिया करते हैं गुजरती रही जमीले-ए-जवानी और एक दिन गुजर ही गयी अब तो कोई सीखा दे इस उम्र में उल्फ़त-ओ-गुनाह कैसे किया करते हैं दे खुदा तू कज़ा या की दे बता मुझे,निकालने को  दुश्मनी  जॅहा भर के दुश्मन मेरे...... तुझे क्या रिश्वत दिया करते है