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ख़्याल

ये ख़्याल लाज़िम है वो बारे में सोचता क्या है वो देखता है तो हम देखते है की वो देखता क्या है बेशक अभी मैं जीता नही अभी तक तो नही देखेंगे लस्कर जो हारा नही घुटने टेकता क्या है चला जाता है हुज़ूम सड़को पे जाने कहाँ मुआंमला हो साफ भीड़ मे चलता क्या है आज लगा के बैठा है ज़ाहिद अल्लाह से मिलेगा मयपरस्ती भी चीज़ है तू समझता क्या है सब कुछ ही शायद ,शायद कुछ भी नही जो कभी हारा  नही वो हारता क्या है दुनियादारी भी क्या शय है देखिए नवाब मैं सोचा था कुछ दिल माँगता क्या है अब जो चली है उसने चाल तो सोचना होगा मरवा के वो वज़ीर आखिर मारता क्या है वो रहा इतना सामने की सामने कुछ ना रहा तुझे जानने वाला भी तुझको जानता क्या है   मैं कह भी देता हू दोस्तों से वो थी ही बदचलन फिर ये रातों  को  सीने में कही कुछ चुभता क्या है

क्या में हूँ मैं

कुछ  नही  तो   क्या   में   हूँ  मैं और  जो  हूँ  तो   क्या  में  हूँ  मैं तगाफुल  तुझसे   मुझसे  भी  मैं किया   जानू   क्या    में   हूँ    मैं साथ   तेरे,  कितने  नही  में हूँ मैं मत  ढूढो  कहीं, कहीं  में  हूँ   मैं था   जहाँ   रहा  वहीं   में  हूँ   मैं ग़लत  भी,  कितने  सही में हूँ  मैं पता  उसका  क्या  पता, में  हूँ   मैं जाने कबसे उसकी खता में हूँ  मैं कबा दौलत सोहरत कुछ तो नही नही गर जो अपनी  क़ता में हूँ मैं

कहता है

काफ़िर ही काफ़िर को काफ़िर कहता है काफ़िर भी काफ़िर को काफ़िर कहता है एक ही ना सारे मज़हब तो एक रहता छोड़िए किससे कोई फिर क्या कहता है जिंदगी रोशनी ज़रिया नाखुदा कोई उसे कुछ तो कोई कुछ कहता है या नबी दे मक़ा उस दिल में या मर्ग गुजरा है जो कुचे से हर शक्स कहता है सितम यही की मैं उसका वफ़ादार नही दे देगा वो मेरे लिए जाँ कहता है दोस्त ने कहा चल जहा जाना है ये नही होगा जब जहाँ कहता है कह जाता है वो बहुत कुछ मुझसे जब वो कुछ और नही कहता है

किरदार

ना रहो अगर मगर में रहो जो तुम सफ़र में जो न मिल सका वो काश है यूँ तो सभी को कुछ तलाश है बेख़बर नही होशियार है लोग पहले से तैयार हैं औरों  को  क्यूँ देखें हम तुम भी तो किरदार है

नजम

जो ना हो बात तो बात बनाना नही आता हमे बातों के पीछे बात छूपाना नही आता वो कल भी नीदं  में था वो आज भी  है क्या पता थी जो उल्फत वो आज भी है क्यू बन  गया मेरा  मुंसीफ  ही  कातिल वो बाहिरे-अक्ल  था कल वो आज भी है

कर रहे हैं

जो कर रहे हैं  वो कर रहे हैं  ना करते ये तो करते जो कहां कर रहे हैं

मकान ही मेरा घर था

प्यार तेरा सरकारी मकान जैसा ही था ,ज़िंदगी लगभग गुजर ही गयी, किराया तो नाम का था कीमत कहां थी उसकी. कीमत का अहसास उस दिन हुआ जब मकान छोडने का वक्त आया, ईट गारे से एक घर तो खड़ा लिया मैने पर जेहन से पीले रंग की दीवारे और हरे स्लेटी रंग का दरवाजा नहीं गया. कुछ देर के लिये ही सही पर वो मकान ही मेरा घर था