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है मुहब्बत ना ही कोई आसार है

है मुहब्बत ना ही कोई आसार है जिंदगी यूँ है कि जैसे रविवार है तैर आगों के दरिया में ग़ालिब मगर जिंदगी से हमें तो बहुत प्यार है कुछ नही है पता जाना भी है कहाँ जाने को भीड़ सारी पर तैयार है हमसे पूछो न तबियत हमारी कोई वो जो देखें नही समझो बेकार है खुश हैं हम ये हमारी गलतफहमी है पर छोड़ो ये भी तो अच्छा आजार है दिल दवा दारू क्या और चाहिए उस गली में इन्ही का तो बाजार है पूछो मत किस तरह है कटी जिंदगी बस कटा और कटने का आसार है है तुम्हे जो यकीं बाहें जन्नत हैं वो कुछ नही है अभी बस तू बीमार है ये खुमारी भी तेरी होनी है ख़तम चीज़ कहता जिसे आजकल प्यार है जो रकीबो ने माँगी दुआ मौत की बदले मेरे उन्ही के कटे तार हैं समझा मैं जो नही बातें मतलब की ये यार  बन बैठा उनका मेरा यार है जिंदगी चल  रही  थोड़ी थोड़ी सही थोड़ा थोड़ा मगर क्या ही बेकार है मीटर 212 212 212 212 नवाब

जलकुंभी

जलकुंभी बुरे ख्याल पानी मे जलकुंभी की तरह होते हैं। एक ख्याल ,दो और बुरे ख्यालों को पैदा करता है । अगले ख्याल फिर चार और पैदा कर देते हैं। एक सिरीज़ प्रारंभ हो जाती है। एक छोटा सा लगने वाला बुरा ख्याल , ख्यालो और सवालों की अनन्त जलकुंभी फैला देता है। जलकुंभिया रोज अपनी जड़ें मजबूत करती चली जाती हैं। पानी का बहाव रुकने लगता है। पानी मे सड़न की शुरुवात हो जाती है। ये सड़न गलन जलकुंभियों के लिए खाद का काम करते हैं। जलकुंभिया इतनी फैल जाती है कि ढूढ़ने से भी जलकुंभी का प्रारम्भ और अंत नही मिलता। मस्तिष्क सवालों का जवाब भी तैयार करता है पर जवाबों में भी ये जलकुंभिया उलझी रहती हैं। स्पष्ट कुछ भी नज़र नही आता। जवाब भी एक नया सवाल खड़ा करते नज़र आता है। इन सवालों जवाबो से निपटने की ट्रेनिंग कोई नही देता। जिंदगी एक अच्छी प्रशिछक है पर उसकी फीस बहुत ज्यादा है । इसका कोर्स भी कभी खत्म नही होता। चूंकि ये जिंदगी है तो इस पर कोई रूल्स रेगुलेशन भी नही हैं, ये अपने हिसाब से मार पीट के सिखाती है। ऐसा नही है कि इस समस्या का कोई अल्टरनेट सोल्यूशन नही है , हज़ारो सालों से बहुत से लोग आए । बहुत अच्छे अच्छे लोग ...

फैसला जो भी हो इस दिल का

2122 1122 1122 22 फैसला जो भी हो इस दिल का बताया जाए दिल नही इतना भी हर रोज जलाया जाए हो गुनाह उसका या मेरा मगर हाकिम को जब सुनानी हो सजा मुझको बुलाया जाए कायदा है वो सुनाता कायदे से हमको आइना उसको भी मगर कुछ दिखाया जाए हिज़्र की बात पे मुझसे वो लिपट जाते थे आज आलम है की नाता ही छुड़ाया जाए आग से है जो मुहब्बत तो वफ़ा में अपनी आशियाँ खुद का ही अब खुद से जलाया जाए हैं मिले धोखे ,वफ़ा भी तो लोगो मे होगी हौसला दिल को मगर क्यूँ न दिलाया जाए अविनाश कुमार "नवाब"

वो था कमज़र्फ

वो था कमज़र्फ आफताब हो गया मैं होके अच्छा भी खराब हो गया बेहतरी थी किसमे मैं क्या जनता मिला जो सख्स अहबाब हो गया वो क्या जगा था मुझमें इस  तरह की नींदों का आना ख़्वाब हो गया जहाँ था कभी  झीलों का  शहर सुना पानी वहाँ सुरखाब हो गया

न मोहब्बत है ना ििनतज़ार है

ना मोहब्बत है ना  इंतज़ार है जिंदगी है कि जैसे रविवार है तू आग  दरिया में तैर ग़ालिब हमें  जिंदगी से  बहुत प्यार है जाना है कहाँ कुछ पता  नही जाने को भीड़ मगर तैयार  है हमसे न  पूछो तबियत हमारी वो देखें नही समझो बेकार है हम खुश हैं  ये गलतफहमी है पर छोड़ो ये अच्छा आजार है दिल  दवा  दारू  क्या चाहिए उनकी गली में  यही बाजार है जितने हैं गली मुहल्ले में लौंडे कमजर्फों को तुझी से प्यार है है कटी  की जिंदगी पूछो  मत कटा  है कटने  का आसार  है तुम्हे यकीं बाहों  में जन्नत  का कुछ नही  ये  जन्नती बुखार है खुमारी  ये  भी  उतरेगी  कल चीज़ जिसे  कहते  हो प्यार है रकीबों ने  की दुआ  मौत  की रकीब  मर  रहे  चम्तकार   है नही  समझा आंखों  की बातें आज मेरा  यार उनका यार है जिंदगी चल  रही  थोड़ी थोड़ी थोड़ा थोड़ा  सबका  उधार  है नवाब

न किया हाँ कहने के बाद

ना किया हां कहने के बाद क्या हो जाने क्या के बाद घुल रहा है क्या फ़िकर में क्या रहे घुलने के बाद हैं सवाल अपनी जग़ह क्या हो हल मिलने के बाद मैं था कुछ और पहले हूँ कुछ और जलने के बाद जिंदगी है गयी जाने किधर दर से तेरे चलने के बाद तू मुझको लेने फिर से आये गिरता हूँ सम्हलने के बाद था मुंतज़िर मैं जाने किसका होने से पहले होने के बाद

पहली ग़ज़ल जो मैंने मीटर में लिखी

पहली ग़ज़ल जो मैंने मीटर में लिखी क्या हुआ दिल क्या हुआ मुझको बता कोई आया याद क्या मुझको बता 2122 2122 212 दिल लगाने का हुनर जब था नही दिल लगाया क्यूँ ये दिल मुझको बता इस भरी सी बज़्म में उसका जिकर है चला तो क्यूँ चला मुझको बता ख़ाब मेरे ख़ाब भी मेरे नही सोचता है ख़ाब क्या मुझको बता गिर्या भी है बहते बहते बह गया था रुका तू किस लिये मुझको बता