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इन लव विथ टोक्यो

रफ़ी साहब का एक गाना है। सिनेमा का नाम था लव इन टोक्यो । वैसे तो इस पिक्चर का हर गाना ही अच्छा है। पर दो गाने मुझे खास तौर पर पसंद आते हैं। पहला गाना है जो लता जी ने गाया ।" कोई मतवाला आया मेरे द्वारे", दूसरा गाना है "आजा रे आ ज़रा" । इस गीत में खूबियों की क्या बात की जाए। बहुत सारी हैं। सबसे पहला क्रेडिट जाता है शंकर जयकिशन साहब को , जिनकी म्यूजिक का मैं बहुत बड़ा फैन हूँ । अपने जमाने के हिसाब से बहुत ही आगे की और ज़बरदस्त म्यूजिक इस जोड़ी ने तैयार की। शंकर जैकिशन को यू समझिये की जैसे बाहुबली प्री एरा और बाहुबली पोस्ट एरा । ऐसा नही था कि शंकर जयकिशन के पहले अच्छी म्यूजिक नही दी जा रही थी लेकिन इन्होंने म्यूजिक का कैनवास बदल के रख दिया । भारतीय संगीत में ऑरकेस्ट्रा का लाया जाना शंकर जयकिशन की देन है। अब म्यूजिक में सिर्फ तबला और हारमोनियम ही नही थे बैकग्राउंड में चालीस चालीस वायलिन बज रहे होते थे ,आठ नौ टाइप के परकशन चल रहे थे, सेलो और पियानो जैसे अपारंपरिक वाद्य यंत्रों का यूज़ शंकर जयकिशन ने अपने संगीत में बख़ूबी किया । जब बाकि संगीतकार धुने बना रहे थे तो शंकर जयकिशन सिम...

बीमार होने में वो मज़ा न रहा

बीते दिनों की याद आते ही याद आता है कि जिंदगी मुश्किल थी पर लोग आसान थे, आज जिंदगी आसान है और लोग मुश्किल। न जाने ही कितने पहरे और सरहदें बना ली है अपने दरम्यां हमने । कोई रिश्ता सीधे मतलब का नही बल्कि और कहो तो मतलब के ही सब रिश्ते दिखाई देते हैं। अनाज गेंहू में तो मिलावट थी ही पर सब्र था कि ये अनाज खा के बीमार पड़ भी गए तो , चार जानने वाले धमक पड़ेंगे। कोई सर दबा देगा, कोई थर्मामीटर लेकर बैठ जायगा , कोई डॉक्टर बुला लेगा । जब ऐसा माहौल हो तो कौन बीमार नही पड़ना चाहेगा । बीमारी फिर बीमारी कहाँ रहती है। अपनापन ,दोस्ताना माहौल और प्यार की ताकत क्या होती है। ये  ऐसे वक़्त ही समझ  आता था। अगर ऐसा ही माहौल बना रहता तो शायद कैंसर का भी इलाज नही कराना पड़ता।  हा जी ये थोड़ा ज्यादा हो गया। पर इसे अतिशयोक्ति अलंकार ही समझ लीजिए । कहने के पीछे भावना ये है कि एक जमाना था, लोग अपने आस पास के लोगो की परवाह करते थे । इस प्रकार का मोरल सपोर्ट रहने पर आज की तरह लोग बीपी, हाइपर टेंशन और अवसाद की बीमारियों से ग्रस्त नही रहते थे। ये आपसी मेलजोल की भावना हमारे कल्चर की एक महान देन थी हमारे समाज को...

हार

ये नजरिये की बात हो सकती है पर मैं समझता हूं कि जिंदगी की खूबसूरती को जीत के वक़्त नही बल्कि हार के समय महसूस किया जा सकता है। सफलता और जीत का जीवन मे एक अलग स्थान है पर ये असफलता होती है जो हमें और बेहतर बनाती है। चीज़ों को देखने के प्रति हमारा नजरिया बदल देती है। हमें ज्यादा ह्यूमेन बनाती है।  जिस वक्त इंसान असफलताओ से घिरा होता होता है, वक़्त उसके लिए धीमा हो जाता है। उसके पास होता है तो सिर्फ वक़्त।ये वही वक़्त होता है जब प्रेम में असफल व्यक्ति गुलज़ार के लिखे गानों का भी मतलब समझने लगता है और कैरियर में असफल व्यक्ति विवेकानंद की जीवनी पड़ने लगता है। असफलता का एक गुण है कि वो हमें मानवीय संबंधों के उन पहलुओं को जानने और समझने के लिए मजबूर कर देती है जो हमारे साथ रहते हुए भी हमें दिखाई नही देते। नज़र का चश्मा और बेहतर हो जाता है।हार पीछे तो ले जाती है मगर और आगे ले जाने के लिए । ये समझने की नही आत्मसात करने की बात है।  हो सकता है कि आप भविष्य में एक बड़ा मुकाम हासिल करें, लक्सरी लाइफ एन्जॉय करें, बुर्ज खलीफा में फाइन डिनर करें, यूरोप घूमें पर अपने संघर्ष के दिनों में दिल्ली के उस 8*...

ग़ज़ल

मिरे जब से हैं बिगड़े हालात सुनिए जो हैं कुछ नही उनकी बेबात सुनिए की हो कायदे में रहें बातें जो हों ये भी क्या हुई बात हर बात सुनिए कहे जा रही है जो मन मे आ रहा है तो फिर क्या ये दुनिया की दिन रात सुनिए हमी खेल में हों कोई दूसरा न मज़ा फिर है क्या जो न शह मात सुनिए अविनाश कुमार "नवाब"

ग़ज़ल

ये दुनिया में भेड़चाल क्यों है सवाल है की सवाल क्यों है नही है जब तो कहो नही भी है हाल ये तो ये हाल क्यों है वो वस्ल की बात पे है ठिठकी न पूछो रुखसार लाल क्यों है चली ही जाती है इक कहानी वो साल हर एक साल क्यों है नाराज भी तुम होती नही हो नही मुझे भी मलाल क्यों है नही है जिनका खुदा है उनका मिसाल भी ये मिसाल क्यों है नवाब

ग़ज़ल

खिर्दो अकल नही कुछ बादाम खा रहे हैं गालिब मगर गधे ही बस आम खा रहे हैं आया समझ है कैसे मछली चढ़ी शज़र पे धोखा  मिला है  उल्टा  इल्जाम खा रहे हैं क्या  क्या ही बेचते  हैं जो शब्द बेचते हैं वो बेच  के  खुदा  का  पैगाम खा  रहे हैं कैसे कहे  उसे  हम झूठा  है आदमी  वो धोखा इसीलिए हम गुलफ़ाम  खा रहे है है मर्ज ये ही अब तो मिलना न हो सकेगा बस हम ज़हर  दवाई  के नाम खा रहे हैं दौलत पे बाप  दादा की ऐश चल रही है आजाद देश को अब हुक्काम खा रहे हैं हैं इस कदर अमादा  खाने को  लोग सारे बाबा जो ढोंग फतवों पर इमाम खा रहे हैं नवाब

ग़ज़ल

जख्म हालातों के भर जायेंगे क्या छोड़ आये हैं जो घर जाएंगे क्या कश्मकश में आजकल हर जिंदगी लोग हद से अब गुजर जाएंगे क्या माना की सबसे बहादुर हम नही तुम डराओगे तो डर जाएँगे क्या वो सलीके से है बातें कर रही माने की रिश्ते बिखर जाएंगे क्या दूर तुम भी हो नही हम भी नही फासले अपने मगर जाएंगे क्या